देवशयनी एकादशी 2026 एवं व्रत कथा
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देवशयनी एकादशी 2026 एवं व्रत कथा: तारीख, भारत में पारण, पूजा, मंत्र, उपाय और नियम
आषाढ़ी, हरिशयनी और पद्मा एकादशी की सही तिथि, प्रमुख भारतीय शहरों का पारण समय, भगवान विष्णु की पूजा, शयन-विधि, राजा मांधाता की संपूर्ण व्रत कथा, चातुर्मास के नियम, आध्यात्मिक उपाय और स्वास्थ्य-सुरक्षित उपवास मार्गदर्शन।
देवशयनी एकादशी 2026 एक नज़र में
व्रत की तारीख: शनिवार, 25 जुलाई 2026
पारण की तारीख: रविवार, 26 जुलाई 2026
पक्ष एवं मास: आषाढ़ शुक्ल पक्ष एकादशी
एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई, सुबह लगभग 9:12 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई, सुबह लगभग 11:34 बजे
द्वादशी समाप्त: 26 जुलाई, दोपहर लगभग 1:57 बजे
नई दिल्ली पारण: सुबह लगभग 5:39 से 8:22 बजे
मुख्य देवता: भगवान विष्णु या श्रीनारायण
विशेष स्वरूप: शेषशायी विष्णु, पद्मनाभ, वामन और विट्ठल
अन्य नाम: आषाढ़ी एकादशी, हरिशयनी एकादशी, पद्मा एकादशी और विष्णु शयनी एकादशी
महाराष्ट्र की परंपरा: पंढरपुर आषाढ़ी एकादशी एवं विट्ठल-रुक्मिणी दर्शन
मुख्य मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
शयन प्रार्थना: सुप्ते त्वयि जगन्नाथे जगत्सुप्तं भवेदिदम्
चातुर्मास प्रारंभ: 25 जुलाई 2026
स्मार्त देवउठनी एकादशी: शुक्रवार, 20 नवंबर 2026
देवशयनी एकादशी 24 जुलाई को है या 25 जुलाई को?
एकादशी तिथि 24 जुलाई की सुबह प्रारंभ हो जाएगी, लेकिन हिन्दू व्रत की तारीख केवल तिथि शुरू होने के समय से तय नहीं होती।
24 जुलाई के सूर्योदय के समय दशमी तिथि होगी। 25 जुलाई के सूर्योदय पर एकादशी तिथि विद्यमान रहेगी और सुबह 11:34 बजे तक चलेगी।
इसलिए भारत में स्मार्त और सामान्य वैष्णव पंचांग के अनुसार देवशयनी एकादशी का व्रत शनिवार, 25 जुलाई 2026 को रखा जाएगा।
कथा और धार्मिक स्रोत से संबंधित आवश्यक जानकारी
देवशयनी एकादशी से संबंधित धार्मिक साहित्य में दो प्रमुख कथा-प्रवाह मिलते हैं।
पहला: पद्मपुराण उत्तरखण्ड में युधिष्ठिर और श्रीकृष्ण के संवाद के माध्यम से शयनी एकादशी, भगवान वामन, राजा बलि और भगवान विष्णु के योगनिद्रा-काल का वर्णन मिलता है।
दूसरा: पूजा-पुस्तकों में प्रचलित व्रत कथा राजा मांधाता के राज्य में पड़े अकाल, ऋषि अंगिरा के आश्रम और सामूहिक एकादशी-व्रत से जुड़ी है। कई कथा-संग्रह इसे भविष्योत्तर पुराण की परंपरा से जोड़ते हैं।
पुरानी मांधाता कथा के कुछ पाठों में जन्म और वर्ण के आधार पर एक तपस्वी के प्रति हिंसा का सुझाव मिलता है। राजा उस सुझाव को स्वीकार नहीं करते। आधुनिक नैतिकता, भारतीय संविधान और NityaPuja की संपादकीय नीति जन्म-आधारित भेदभाव या हिंसा को स्वीकार नहीं करती। कथा का उपयोग अहिंसा, उत्तरदायित्व और सामूहिक अनुशासन की शिक्षा के रूप में किया गया है।
इस लेख में
- देवशयनी एकादशी क्या है?
- देवशयनी एकादशी 2026 की तारीख और तिथि
- भारत के प्रमुख शहरों का पारण समय
- पारण क्या है और सही नियम क्या हैं?
- इस दिन किस देवता की पूजा करें?
- भगवान विष्णु की योगनिद्रा का अर्थ
- देवशयनी एकादशी और चातुर्मास
- दशमी से व्रत की तैयारी
- घर पर 15 मिनट की सरल पूजा
- विस्तृत देवशयनी एकादशी पूजा-विधि
- भगवान विष्णु को शयन कराने की विधि
- राजा मांधाता की संपूर्ण व्रत कथा
- पद्मपुराण का वामन एवं राजा बलि प्रसंग
- व्रत कथा की मुख्य शिक्षाएँ
- एकादशी में क्या खाएँ?
- द्वादशी पारण की सही विधि
- प्रमुख विष्णु मंत्र और शयन प्रार्थना
- विष्णु आरती
- चातुर्मास का सरल संकल्प
- पारंपरिक आध्यात्मिक उपाय
- कामकाजी, बुजुर्ग और रोगी व्यक्तियों के लिए सुझाव
- क्या करें और किन बातों से बचें?
- संपूर्ण Checklist
- NityaPuja पर संबंधित मार्गदर्शिकाएँ
- सामान्य प्रश्न, निष्कर्ष और अस्वीकरण
1. देवशयनी एकादशी क्या है?
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं।
“देवशयनी” का अर्थ है देवता का शयन। इसे हरिशयनी एकादशी भी कहा जाता है, क्योंकि “हरि” भगवान विष्णु का नाम है।
महाराष्ट्र में यही तिथि आषाढ़ी एकादशी के रूप में अत्यंत प्रमुख है। वारकरी परंपरा के श्रद्धालु संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम और अन्य संत-परंपराओं से जुड़ी पालखियों के साथ पंढरपुर पहुँचकर भगवान विट्ठल और माता रुक्मिणी के दर्शन करते हैं।
यह तिथि चातुर्मास की शुरुआत से भी जुड़ी है। आने वाले चार महीनों को वर्षा, संयम, अध्ययन, जप, सेवा और आंतरिक साधना का समय माना जाता है।
सरल समझ:
देवशयनी एकादशी बाहरी उत्सवों की गति धीमी करके चार महीने के आत्मचिंतन, अनुशासन और सात्त्विक जीवन का आरंभ करने वाली तिथि है।
2. देवशयनी एकादशी के अन्य नाम
| नाम | प्रमुख क्षेत्र या अर्थ |
|---|---|
| देवशयनी एकादशी | भगवान विष्णु के योगनिद्रा में प्रवेश का दिन |
| हरिशयनी एकादशी | श्रीहरि के शयन से संबंधित नाम |
| आषाढ़ी एकादशी | महाराष्ट्र और पंढरपुर की प्रमुख परंपरा |
| पद्मा एकादशी | कमल और पद्मनाभ विष्णु से संबंधित प्रचलित नाम |
| विष्णु शयनी एकादशी | शेषशायी नारायण के शयन का स्पष्ट नाम |
| तोली या पहली एकादशी | तेलुगु भाषी क्षेत्रों की क्षेत्रीय परंपरा |
3. देवशयनी एकादशी 2026 की तारीख और तिथि
भारत में व्रत की मुख्य तारीख
शनिवार, 25 जुलाई 2026
आषाढ़ शुक्ल एकादशी
| पंचांग विवरण | भारत मानक समय |
|---|---|
| एकादशी प्रारंभ | 24 जुलाई 2026, सुबह लगभग 9:12 बजे |
| एकादशी समाप्त | 25 जुलाई 2026, सुबह लगभग 11:34 बजे |
| द्वादशी प्रारंभ | 25 जुलाई, सुबह लगभग 11:34 बजे |
| द्वादशी समाप्त | 26 जुलाई, दोपहर लगभग 1:57 बजे |
| पारण दिवस | रविवार, 26 जुलाई 2026 |
4. देवशयनी एकादशी 2026 पारण समय—भारत
व्रत की तारीख पूरे भारत में 25 जुलाई है, लेकिन पारण का समय स्थानीय सूर्योदय के अनुसार बदलता है। नीचे अलग-अलग क्षेत्रों के प्रतिनिधि शहर दिए गए हैं।
| शहर या क्षेत्र | 26 जुलाई 2026 पारण समय |
|---|---|
| नई दिल्ली | सुबह लगभग 5:39–8:22 |
| पंचकूला एवं चंडीगढ़ क्षेत्र | सुबह 5:36–8:21 |
| मुंबई | सुबह 6:13–8:50 |
| इंदौर क्षेत्र | सुबह लगभग 5:56–8:35 |
| कर्नाटक का चिचोली क्षेत्र | सुबह 5:58–8:33 |
| तिरुपति | सुबह 5:56–8:29 |
| विशाखापत्तनम | सुबह 5:34–8:10 |
| गुरुवायूर, केरल | सुबह 6:14–8:45 |
| तुरा, मेघालय | सुबह 4:53–7:34 |
महत्वपूर्ण:
ऊपर दिए समय प्रतिनिधि शहरों के हैं। अपने निवास-स्थान के सूर्योदय और स्थानीय मंदिर की परंपरा के अनुसार शहर-विशिष्ट पारण समय की पुष्टि करें।
5. पारण क्या है और इसका सही नियम क्या है?
द्वादशी के दिन विधिपूर्वक एकादशी का उपवास समाप्त करने को पारण कहा जाता है।
- पारण एकादशी के अगले दिन अर्थात द्वादशी पर किया जाता है।
- सामान्यतः सूर्योदय के बाद पारण करें।
- पारण हरिवासर समाप्त होने के बाद किया जाता है। 2026 की इस एकादशी में हरिवासर द्वादशी की पिछली शाम ही समाप्त हो जाएगा।
- पारण को द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले पूरा करना चाहिए।
- प्रातःकालीन अनुशंसित समय सबसे सरल और उपयुक्त है।
- पारण से पहले भगवान विष्णु को जल, तुलसी और नैवेद्य अर्पित करें।
- पारिवारिक परंपरा अनुसार तुलसी-जल, फल, खजूर, दूध या हल्के सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें।
- लंबे उपवास के बाद अचानक अत्यधिक तला, मसालेदार या भारी भोजन न करें।
6. देवशयनी एकादशी पर किस देवता की पूजा करें?
| देव स्वरूप | परंपरा | पूजा का भाव |
|---|---|---|
| भगवान विष्णु या नारायण | मुख्य एकादशी उपासना | संरक्षण, धर्म और संतुलन |
| शेषशायी विष्णु | क्षीरसागर की योगनिद्रा | गहरी विश्रांति के भीतर सजग चेतना |
| भगवान वामन | पद्मपुराण की शयनी एकादशी परंपरा | विनम्र रूप में धर्म की स्थापना |
| भगवान विट्ठल | पंढरपुर एवं वारकरी परंपरा | नाम-स्मरण, समानता और भक्त-संगति |
| माता लक्ष्मी | लक्ष्मी-नारायण संयुक्त पूजा | अन्न, व्यवस्था और जिम्मेदार समृद्धि |
| तुलसी माता | वैष्णव पूजा का प्रमुख पत्र | पवित्रता, सेवा और नियमित भक्ति |
7. भगवान विष्णु की योगनिद्रा का क्या अर्थ है?
भगवान विष्णु का शयन मनुष्य की सामान्य थकान या अचेत नींद के समान नहीं माना जाता। धार्मिक भाषा में इसे योगनिद्रा कहा गया है।
योगनिद्रा ऐसी दिव्य अवस्था का संकेत है जिसमें बाहरी गतिविधि शांत दिखाई देती है, लेकिन मूल चेतना और व्यवस्था बनी रहती है।
वर्षा ऋतु में पुराने समय में लंबी यात्राएँ, बड़े सामाजिक आयोजन और निर्माण-काम कठिन हो जाते थे। इसलिए यह अवधि बाहर की गति कम करके साधना, अध्ययन और सेवा बढ़ाने का स्वाभाविक समय भी बनी।
देवशयनी से देवउठनी तक का क्रम प्रकृति की ऋतु-चक्र आधारित धीमी गति, संरक्षण और पुनः सक्रियता को धार्मिक प्रतीक में व्यक्त करता है।
आध्यात्मिक संकेत:
हर समय अधिक काम करना ही प्रगति नहीं है। कभी-कभी शांत होकर जीवन की दिशा, आदतों और जिम्मेदारियों की समीक्षा करना भी आवश्यक है।
8. देवशयनी एकादशी और चातुर्मास
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास का धार्मिक काल प्रारंभ माना जाता है। “चातुर्मास” का सामान्य अर्थ चार महीने है।
इस अवधि में श्रावण, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास आते हैं। अलग पंचांग तथा संप्रदायों में चातुर्मास की समाप्ति की गणना में थोड़ा अंतर हो सकता है।
| चातुर्मास का पक्ष | व्यावहारिक रूप |
|---|---|
| जप और पाठ | एक निश्चित मंत्र, गीता, विष्णु सहस्रनाम या सरल स्तोत्र का नियमित पाठ |
| आहार संयम | एक अनावश्यक खाद्य आदत, नशा या अत्यधिक तला भोजन कम करना |
| वाणी संयम | गाली, कटुता, चुगली और अनावश्यक विवाद से दूरी |
| सेवा | अन्न, शिक्षा, स्वास्थ्य या पर्यावरण से जुड़ी नियमित सहायता |
| अध्ययन | धार्मिक ग्रंथ के साथ अपने कार्य या कौशल का नियमित अध्ययन |
| मांगलिक संस्कार | कई परंपराओं में विवाह और गृहप्रवेश जैसे आयोजन स्थगित किए जाते हैं |
स्पष्टीकरण:
चातुर्मास में पूजा, जप, दान, शिक्षा, चिकित्सा, कानूनी कार्य, रोजगार, दैनिक व्यापार और आवश्यक जीवन-कार्य बंद नहीं होते। विराम मुख्यतः कुछ संस्कारों और उत्सवी मांगलिक आयोजनों से संबंधित क्षेत्रीय परंपरा है।
9. दशमी से व्रत की तैयारी कैसे करें?
- शुक्रवार, 24 जुलाई को भोजन हल्का, ताजा और सात्त्विक रखें।
- परिवार की परंपरा हो तो सूर्यास्त के बाद अनाज और दाल न लें।
- तंबाकू, शराब और अन्य नशे से पूरी तरह दूरी रखें।
- पर्याप्त पानी पिएँ, विशेषकर गर्मी, यात्रा या बीमारी की स्थिति में।
- पूजा सामग्री, फल और पारण का हल्का भोजन पहले तैयार रखें।
- रात में बहुत देर तक जागने के बजाय पर्याप्त विश्राम लें।
- निर्जल या कठोर उपवास का संकल्प स्वास्थ्य की वास्तविक स्थिति देखकर ही लें।
10. घर पर 15 मिनट की सरल देवशयनी एकादशी पूजा
- स्नान करके या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- भगवान विष्णु, लक्ष्मी-नारायण, शालिग्राम या विट्ठल-रुक्मिणी का चित्र रखें।
- घी का दीपक जलाकर भगवान गणेश का संक्षिप्त स्मरण करें।
- भगवान विष्णु को जल, पीला चंदन, अक्षत और पुष्प अर्पित करें।
- स्वच्छ तुलसीदल उपलब्ध हो तो श्रद्धापूर्वक अर्पित करें।
- फल, मिश्री या बिना अनाज का सात्त्विक नैवेद्य रखें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” 11, 27 या 108 बार जपें।
- नीचे दी गई देवशयनी एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “ॐ जय जगदीश हरे” आरती करें।
- चातुर्मास के लिए एक सरल और निभाने योग्य संकल्प लें।
11. देवशयनी एकादशी की विस्तृत पूजा-विधि
- पूजा-स्थान साफ करके चौकी पर पीला या स्वच्छ हल्के रंग का वस्त्र बिछाएँ।
- भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी, भगवान गणेश और तुलसी माता का स्मरण करें।
- दीपक जलाकर हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर व्रत एवं पूजा का संकल्प लें।
- भगवान विष्णु के चित्र या प्रतिमा को स्वच्छ जल से प्रतीकात्मक स्नान कराएँ। धातु या पत्थर की पूजा-योग्य प्रतिमा हो तभी वास्तविक स्नान करें।
- विशेष परंपरा में पंचामृत स्नान के बाद पर्याप्त स्वच्छ जल से पुनः स्नान कराएँ।
- पीला चंदन, अक्षत, पुष्प और तुलसीदल अर्पित करें।
- धूप और घी का दीप अर्पित करें।
- मौसमी फल, मखाना, मिश्री या उपवास-योग्य सात्त्विक नैवेद्य रखें।
- द्वादशाक्षर मंत्र “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” 108 बार जपें।
- विष्णु सहस्रनाम, गीता का बारहवाँ या पंद्रहवाँ अध्याय अथवा सरल विष्णु स्तुति पढ़ें।
- राजा मांधाता की व्रत कथा पढ़ें।
- संध्या में भगवान विष्णु की पुनः पूजा और आरती करें।
- भगवान के लिए छोटी, स्वच्छ शय्या बनाकर शयन प्रार्थना पढ़ें।
- चातुर्मास में अपनाए जाने वाले एक या दो व्यावहारिक नियमों का संकल्प लें।
- अगले दिन शहर-विशिष्ट पारण समय में पूजा करके व्रत खोलें।
12. भगवान विष्णु को शयन कराने की सरल विधि
घर में प्रतिमा को वास्तव में उठाकर शय्या पर रखना अनिवार्य नहीं है। चित्र के सामने भी प्रतीकात्मक शयन-पूजा की जा सकती है।
- संध्या आरती और नैवेद्य के बाद स्वच्छ सफेद या पीले वस्त्र से छोटी शय्या तैयार करें।
- चल प्रतिमा हो तो अत्यंत सावधानी से शय्या पर रखें। स्थिर प्रतिमा या चित्र को न हिलाएँ।
- भगवान को पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
- नीचे दी गई शयन प्रार्थना पढ़ें।
- चार महीने के आत्मसंयम और सेवा का संकल्प लें।
- जलते दीपक या धूप को रातभर बिना निगरानी न छोड़ें।
विष्णु शयन प्रार्थना
सुप्ते त्वयि जगन्नाथे जगत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥
भावार्थ: हे जगन्नाथ! आपके योगनिद्रा में जाने पर यह चराचर जगत भी शांत होता है और आपके जागने पर पुनः जाग्रत होता है।
13. देवशयनी एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा
॥ श्री देवशयनी एकादशी व्रत कथा ॥
युधिष्ठिर ने पूछा एकादशी का महत्व
धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा, “हे केशव! आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का क्या नाम है? इस दिन किस देवता की पूजा की जाती है और व्रत की विधि क्या है?”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा, “हे राजन्! यह एकादशी देवशयनी, हरिशयनी और पद्मा एकादशी के नाम से जानी जाती है। यह भगवान विष्णु को समर्पित है। इसके संबंध में राजा मांधाता की एक प्राचीन कथा सुनो।”
धर्मपरायण राजा मांधाता
प्राचीन समय में सूर्यवंश में मांधाता नाम के एक प्रतापी राजा हुए। वे सत्य बोलते थे, न्याय का पालन करते थे और अपनी प्रजा को अपने बच्चों के समान मानते थे।
उनके राज्य में खेती अच्छी होती थी, व्यापार व्यवस्थित था और लोगों को भोजन तथा आवश्यक वस्तुओं की कमी नहीं रहती थी।
राजा कर और राजकीय व्यवस्था में न्याय रखने का प्रयास करते थे। बीमारी, आपदा या कठिनाई में प्रजा की सहायता करना वे अपना कर्तव्य मानते थे।
राज्य में पड़ा भयंकर अकाल
एक समय लगातार वर्षा न होने के कारण राज्य में गंभीर सूखा पड़ गया। खेतों की फसल नष्ट हो गई, तालाब और कुएँ सूखने लगे तथा पशुओं के लिए चारा कम हो गया।
अन्न के अभाव में यज्ञ, दान और सामान्य सामाजिक कार्य भी रुक गए। गरीब परिवारों तथा पशुओं की स्थिति विशेष रूप से कठिन हो गई।
राज्य के लोग राजा के पास पहुँचे और बोले, “महाराज! वर्षा के बिना अन्न उत्पन्न नहीं हो रहा। हमें भोजन और पानी का गंभीर संकट है। कृपया कोई उपाय खोजिए।”
राजा मांधाता ने उनकी बात सुनकर कहा, “राजा के रूप में प्रजा की रक्षा और व्यवस्था मेरी जिम्मेदारी है। मैं इस संकट का कारण और समाधान खोजने का पूरा प्रयास करूँगा।”
राजा समाधान की खोज में निकले
राजा ने भंडारों से अन्न वितरण, जल-संग्रह और अन्य व्यावहारिक प्रयास आरंभ किए, लेकिन वर्षा न आने के कारण समस्या लगातार बढ़ती रही।
तब राजा कुछ सेवकों के साथ वन में गए, जहाँ अनेक ऋषि और तपस्वी निवास करते थे। वे किसी ऐसे ज्ञानी व्यक्ति से मार्गदर्शन चाहते थे जो संकट को व्यापक दृष्टि से समझ सके।
भ्रमण करते हुए राजा ब्रह्माजी के मानसपुत्र माने जाने वाले महर्षि अंगिरा के आश्रम में पहुँचे।
राजा ने प्रणाम करके राज्य की स्थिति बताई और कहा, “भगवन्! मैंने अपने व्यवहार और शासन की समीक्षा की है, लेकिन ऐसा कोई स्पष्ट अपराध नहीं देख पा रहा जिससे पूरी प्रजा को यह कष्ट मिलना चाहिए। कृपया कोई अहिंसक और धर्मसम्मत मार्ग बताइए।”
पुराने पाठ का कठिन वर्ण-आधारित प्रसंग
इस कथा के कुछ पुराने संस्करणों में ऋषि अंगिरा उस समय की वर्ण-व्यवस्था के आधार पर एक तपस्वी की साधना को अनुचित बताते हैं और उसे दंडित करने का सुझाव देते हैं।
राजा मांधाता ने निर्दोष साधक को मारने से स्पष्ट इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “जो व्यक्ति तपस्या कर रहा है और किसी को हानि नहीं पहुँचा रहा, मैं केवल उसके जन्म के आधार पर उसकी हत्या नहीं कर सकता। कृपया कोई ऐसा उपाय बताइए जिसमें किसी निर्दोष की हिंसा न हो।”
यह कथा का अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ है। आधुनिक दृष्टि में जन्म या जाति के आधार पर भेदभाव और हिंसा अन्यायपूर्ण तथा अस्वीकार्य हैं। राजा का निर्दोष व्यक्ति की हत्या से इनकार करना ही इस प्रसंग से ग्रहण करने योग्य नैतिक शिक्षा है।
ऋषि अंगिरा ने बताया देवशयनी एकादशी व्रत
राजा की अहिंसक दृढ़ता देखकर ऋषि अंगिरा ने कहा, “आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी आने वाली है। तुम प्रजा के साथ भगवान विष्णु की पूजा, आत्मसंयम, उपवास और सेवा का संकल्प लो।”
ऋषि ने समझाया कि केवल कर्मकांड पर्याप्त नहीं है। राज्य को अन्न और जल की उपलब्धता, परस्पर सहयोग, दान तथा अनुशासन पर भी कार्य करना होगा।
राजा ने व्रत-विधि समझी, ऋषि को प्रणाम किया और राजधानी लौट आए।
राजा और प्रजा ने सामूहिक संकल्प लिया
देवशयनी एकादशी के दिन राजा, राजपरिवार, अधिकारी और प्रजा ने अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखा।
भगवान विष्णु की पूजा की गई, नाम-स्मरण हुआ और लोगों ने उपलब्ध अन्न तथा जल को जरूरतमंद परिवारों के साथ बाँटने का संकल्प लिया।
राजा ने राजकीय भंडारों से अन्न-वितरण बढ़ाया, जल-स्रोतों की सफाई कराई और भविष्य में सूखे से बचने के लिए जल-संग्रह की व्यवस्था मजबूत करने का आदेश दिया।
वर्षा और संकट का अंत
कथा के अनुसार व्रत और सामूहिक प्रार्थना के बाद राज्य में वर्षा हुई। खेतों में हरियाली लौटी, जल-स्रोत भरने लगे और धीरे-धीरे अकाल का संकट कम हो गया।
राजा और प्रजा ने इसे भगवान विष्णु की कृपा माना। साथ ही उन्होंने संकट में सीखे जल-संरक्षण, अन्न-सम्मान और सामूहिक सहयोग के नियम नहीं छोड़े।
श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि देवशयनी एकादशी भक्त को आत्मसंयम, दया, सेवा और भगवान विष्णु के प्रति समर्पण का अभ्यास कराती है।
॥ श्री देवशयनी एकादशी व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
14. पद्मपुराण का वामन और राजा बलि प्रसंग
पद्मपुराण की शयनी एकादशी परंपरा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की कथा से भी जुड़ी है।
राजा बलि अत्यंत शक्तिशाली और दानी राजा थे। भगवान विष्णु वामन ब्राह्मण के रूप में उनके यज्ञ में पहुँचे और तीन पग भूमि माँगी।
बलि ने वचन दे दिया। वामन ने विराट रूप धारण करके एक पग में पृथ्वी और दूसरे में स्वर्ग को नाप लिया। तीसरे पग के लिए स्थान न बचने पर बलि ने अपना मस्तक प्रस्तुत कर दिया।
भगवान विष्णु बलि की दानशीलता और वचन-निष्ठा से प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें विशेष लोक और संरक्षण का वर दिया।
एक धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान विष्णु चातुर्मास की अवधि में राजा बलि के यहाँ निवास करते हैं, जबकि शेषशायी स्वरूप में क्षीरसागर में योगनिद्रा भी धारण करते हैं।
कथा की शिक्षा:
वास्तविक दान केवल संपत्ति देना नहीं, बल्कि अपने अहंकार, पद और नियंत्रण की भावना को भी धर्म के सामने समर्पित करना है।
15. देवशयनी एकादशी व्रत कथा की मुख्य शिक्षाएँ
शासक की जिम्मेदारी
संकट में दोष दूसरों पर डालने के बजाय नेतृत्व को समाधान खोजना चाहिए।
निर्दोष की रक्षा
राजा ने जन्म-आधारित हिंसा से इनकार करके न्याय और अंतरात्मा को प्राथमिकता दी।
प्रार्थना के साथ प्रयास
व्रत के साथ जल-संग्रह, अन्न-वितरण और प्रशासनिक कार्य भी आवश्यक हैं।
सामूहिक अनुशासन
बड़े संकट केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज के सहयोग से हल होते हैं।
जल और अन्न का सम्मान
अकाल की कथा प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण का स्पष्ट संदेश देती है।
अहिंसक विकल्प
धार्मिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए निर्दोष व्यक्ति को हानि पहुँचाना स्वीकार्य नहीं है।
16. देवशयनी एकादशी व्रत में क्या खाएँ?
| व्रत का स्वरूप | क्या ग्रहण कर सकते हैं? | किसके लिए? |
|---|---|---|
| जलाहार | जल और आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट, परंपरा एवं स्वास्थ्य अनुसार | केवल स्वस्थ और अनुभवी व्रती |
| फलाहार | फल, नारियल पानी, दूध, दही और सूखे मेवे | अधिकांश स्वस्थ गृहस्थों के लिए |
| एक समय व्रत भोजन | साबूदाना, आलू, शकरकंद, सिंघाड़ा, फल और सेंधा नमक | कामकाजी तथा सक्रिय व्यक्तियों के लिए |
| स्वास्थ्य-सुरक्षित भोजन | हल्का, ताजा और चिकित्सकीय आवश्यकता अनुसार सामान्य भोजन | गर्भवती, बुजुर्ग, बच्चे, रोगी और दवा लेने वाले लोग |
| निर्जल व्रत | जल और भोजन दोनों का त्याग | देवशयनी एकादशी के लिए अनिवार्य नहीं; स्वास्थ्य जोखिम हो सकता है |
एकादशी में सामान्यतः किन चीजों से परहेज किया जाता है?
स्वास्थ्य-सावधानी:
मधुमेह, रक्तचाप, किडनी, लिवर, माइग्रेन, गर्भावस्था, स्तनपान, भोजन-संबंधी विकार या नियमित दवा की स्थिति में चिकित्सक की सलाह के बिना कठोर उपवास न करें।
17. द्वादशी पारण की सरल विधि
- रविवार, 26 जुलाई को अपने शहर के पारण समय से पहले उठें।
- स्नान या हाथ-पैर धोकर भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाएँ।
- जल, पुष्प और तुलसी अर्पित करें।
- “ॐ नमो नारायणाय” 11 बार जपें।
- भगवान को फल, खीर या सात्त्विक भोजन का नैवेद्य रखें।
- पहले तुलसी-जल या साधारण जल ग्रहण करें।
- उसके बाद फल या हल्का भोजन लें।
- लंबा उपवास रखा हो तो भोजन धीरे-धीरे और कम मात्रा में करें।
- क्षमता अनुसार अन्नदान या किसी जरूरतमंद को भोजन कराएँ।
18. देवशयनी एकादशी के प्रमुख मंत्र
1. द्वादशाक्षर विष्णु मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥
भाव: सर्वव्यापक भगवान वासुदेव को नमस्कार।
जप: 11, 27 या 108 बार।
2. अष्टाक्षर नारायण मंत्र
ॐ नमो नारायणाय॥
अवसर: दैनिक विष्णु-पूजा, एकादशी और पारण से पहले।
3. विष्णु ध्यान श्लोक
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
अवसर: पूजा के आरंभ में भगवान विष्णु का ध्यान।
4. विष्णु शयन प्रार्थना
सुप्ते त्वयि जगन्नाथे जगत्सुप्तं भवेदिदम्।
विबुद्धे त्वयि बुध्येत जगत्सर्वं चराचरम्॥
अवसर: संध्या में भगवान को प्रतीकात्मक रूप से शयन कराते समय।
5. लक्ष्मी-नारायण मंत्र
ॐ लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः॥
अवसर: परिवार, अन्न, आर्थिक अनुशासन और गृहस्थ कल्याण की प्रार्थना।
6. विष्णु गायत्री का प्रचलित पाठ
ॐ नारायणाय विद्महे।
वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥
अवसर: विष्णु-पूजा, ध्यान और सद्बुद्धि की प्रार्थना।
19. देवशयनी एकादशी की विष्णु आरती
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख-सम्पत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूँ मैं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूँ मैं जिसकी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
दीनबन्धु दुःखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, सन्तन की सेवा॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
तन-मन-धन सब है तेरा, तेरा तुझको अर्पण।
क्या लागे मेरा, स्वामी क्या लागे मेरा॥
॥ ॐ जय जगदीश हरे ॥
आरती पाठांतर:
अलग परिवारों और पुस्तकों में “भक्त जनों के संकट” के साथ “दास जनों के संकट” तथा अंतिम अंतरों में छोटे शब्द-भेद मिलते हैं। अपनी पारिवारिक आरती-पुस्तक का पाठ भी अपनाया जा सकता है।
20. घर पर चातुर्मास का सरल संकल्प
बड़े और कठिन नियम लेने के बजाय ऐसा संकल्प चुनें जिसे चार महीने नियमित रूप से निभाया जा सके।
“हे भगवान नारायण! आज से देवउठनी एकादशी तक मैं अपनी क्षमता के अनुसार नियमित नाम-जप, सात्त्विक आहार, संयमित वाणी और सेवा का पालन करूँगा/करूँगी। मुझे दिखावे के बजाय निरंतरता, विवेक और करुणा प्रदान करें।”
निभाने योग्य संकल्पों के उदाहरण
21. देवशयनी एकादशी के पारंपरिक आध्यात्मिक उपाय
नीचे दिए उपाय आध्यात्मिक अभ्यास और व्यावहारिक सुधार के लिए हैं। इन्हें चमत्कारी या निश्चित परिणाम की गारंटी न समझें।
मन की अशांति
“ॐ नमो नारायणाय” 27 बार जपें और पाँच मिनट शांत श्वास-अभ्यास करें। लगातार चिंता या अवसाद की स्थिति में मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लें।
आर्थिक अव्यवस्था
लक्ष्मी-नारायण पूजा के बाद अगले चार महीने का आय-व्यय लिखें, अनावश्यक सदस्यता या खर्च रोकें और ऋण-भुगतान की वास्तविक योजना बनाएँ।
घर में तनाव
परिवार के सदस्य साथ दीपक जलाकर एक-दूसरे की बात बिना टोके सुनने का साप्ताहिक नियम लें। गंभीर विवाद में योग्य परामर्शदाता की सहायता लें।
काम में अनियमितता
चातुर्मास के लिए प्रतिदिन एक निश्चित 30 मिनट का बिना मोबाइल कार्य-सत्र तय करें और पूरा होने पर ही अन्य मनोरंजन खोलें।
अन्न और जल की सेवा
स्वच्छ पेयजल, भोजन या राशन ऐसी संस्था या परिवार तक पहुँचाएँ जिसे वास्तविक आवश्यकता हो। प्लास्टिक और भोजन की बर्बादी से बचें।
हानिकारक आदत छोड़ना
भगवान विष्णु के सामने चार महीने का संकल्प लें, ट्रिगर और विकल्प लिखें तथा आवश्यक होने पर चिकित्सक या नशामुक्ति विशेषज्ञ की सहायता लें।
22. अलग-अलग लोगों के लिए व्रत Tips
कामकाजी व्यक्ति
सुबह संक्षिप्त पूजा करें, साथ में फल और पानी रखें तथा शाम को कथा एवं आरती करें।
विद्यार्थी
भूखे रहकर पढ़ाई प्रभावित न करें। फलाहार के साथ 11 मंत्र और एक केंद्रित अध्ययन-सत्र पर्याप्त है।
बुजुर्ग
बैठकर मानसिक पूजा, नाम-जप और कथा-श्रवण करें। दवा तथा सामान्य भोजन समय पर लें।
गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिला
चिकित्सकीय पोषण को प्राथमिकता दें। भोजन के साथ पूजा और मंत्र-जप किया जा सकता है।
यात्रा में रहने वाले
मानसिक जप करें और होटल या वाहन में खुली लौ का प्रयोग न करें। पारण स्थानीय सूर्योदय के अनुसार करें।
मधुमेह या नियमित दवा
दवा छोड़ना या भोजन का समय बदलना खतरनाक हो सकता है। चिकित्सक की सलाह अनुसार स्वास्थ्य-सुरक्षित व्रत चुनें।
23. देवशयनी एकादशी पर क्या करें और किन बातों से बचें?
क्या करें?
किन बातों से बचें?
24. देवशयनी एकादशी 2026 Checklist
A. दशमी की तैयारी
B. एकादशी पूजा
C. द्वादशी पारण
26. देवशयनी एकादशी 2026 से जुड़े सामान्य प्रश्न
1. देवशयनी एकादशी 2026 कब है?
2. एकादशी तिथि कब से कब तक है?
3. व्रत 24 जुलाई को क्यों नहीं रखा जाएगा?
4. नई दिल्ली में पारण कब है?
5. पारण समय शहर के अनुसार क्यों बदलता है?
6. देवशयनी एकादशी पर किसकी पूजा होती है?
7. भगवान विष्णु वास्तव में चार महीने सोते हैं?
8. चातुर्मास कब शुरू होगा?
9. चातुर्मास में क्या विवाह नहीं होते?
10. क्या एकादशी पर निर्जल रहना जरूरी है?
11. क्या एकादशी में चावल नहीं खाते?
12. तुलसीदल कब तोड़ना चाहिए?
13. भगवान विष्णु को शयन कराना आवश्यक है?
14. देवशयनी एकादशी का मुख्य मंत्र कौन-सा है?
15. देवशयनी एकादशी की मुख्य व्रत कथा कौन-सी है?
16. कथा के वर्ण-आधारित प्रसंग को कैसे समझें?
17. व्रत में दवा ले सकते हैं?
18. व्रत भूल से टूट जाए तो क्या करें?
19. क्या व्रत से सभी समस्याएँ निश्चित दूर हो जाती हैं?
27. निष्कर्ष
देवशयनी एकादशी 2026 का व्रत शनिवार, 25 जुलाई को रखा जाएगा और पारण रविवार, 26 जुलाई को शहर-विशिष्ट समय में होगा।
यह भगवान विष्णु की योगनिद्रा, आषाढ़ी एकादशी और चातुर्मास के आरंभ से जुड़ी महत्वपूर्ण तिथि है।
पूजा में दीपक, जल, पीला चंदन, पुष्प, तुलसी, फल और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र पर्याप्त हैं। बड़ा आयोजन या कठोर निर्जल उपवास अनिवार्य नहीं है।
राजा मांधाता की कथा नेतृत्व, अहिंसा, जल-संरक्षण और सामूहिक जिम्मेदारी सिखाती है। पुराने वर्ण-आधारित प्रसंग को आधुनिक धार्मिक निर्देश के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए।
चातुर्मास का सबसे उपयोगी संकल्प वह है जो दिखावे के बजाय भोजन, वाणी, समय, खर्च और सेवा की वास्तविक आदतों में सुधार लाए।
श्रीहरि की योगनिद्रा के साथ बाहरी शोर को शांत करें और अपने भीतर धर्म, अनुशासन और सेवा को जाग्रत रखें।
ॐ नमो नारायणाय
धार्मिक, पंचांग, कथा एवं स्वास्थ्य अस्वीकरण
व्रत की तारीख 25 जुलाई 2026 है, लेकिन पारण स्थानीय सूर्योदय के अनुसार बदलता है। लेख में भारत के कुछ प्रतिनिधि शहरों का समय दिया गया है। अपने शहर के लिए स्थानीय पंचांग देखें।
अलग पंचांग सेवाओं में गणना-पद्धति और अनुशंसित प्रातःकालीन पारण-विंडो में कुछ मिनट या अधिक अंतर मिल सकता है। अपनी पारिवारिक या मंदिर परंपरा को प्राथमिकता दें।
पद्मपुराण में शयनी एकादशी, भगवान वामन, राजा बलि और विष्णु-शयन का वर्णन मिलता है। राजा मांधाता की कथा अलग लोकप्रचलित व्रत-कथा परंपरा में मिलती है।
मांधाता कथा के पुराने पाठ में जन्म और वर्ण से जुड़ा भेदभावपूर्ण प्रसंग मिलता है। NityaPuja जन्म, जाति या समुदाय के आधार पर भेदभाव और हिंसा का समर्थन नहीं करता। कथा को ऐतिहासिक पाठ और अहिंसा की शिक्षा के संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है।
चातुर्मास में मांगलिक कार्यों का विराम धार्मिक और क्षेत्रीय परंपरा है। आवश्यक चिकित्सा, शिक्षा, रोजगार, कानूनी और दैनिक जीवन के कार्य जारी रखे जाते हैं।
व्रत स्वास्थ्य, पोषण और आवश्यक दवा से ऊपर नहीं है। गर्भावस्था, मधुमेह, रक्तचाप, किडनी, लिवर, भोजन-संबंधी विकार या अन्य बीमारी में चिकित्सकीय सलाह लें।
कथा में वर्षा, पाप-नाश और धार्मिक फल के प्रसंग आस्था-आधारित मान्यताएँ हैं। इन्हें वैज्ञानिक, चिकित्सकीय, आर्थिक या अन्य परिणाम की निश्चित गारंटी न समझें।
तिथि, पारण, मंत्र, कथा या क्षेत्रीय परंपरा से संबंधित सुधार अथवा सुझाव के लिए कृपया NityaPuja की संपादकीय टीम से संपर्क करें।